इक पन्ना है बरसों से खाली

मैं तुम्हारे किताब का वो पन्ना हूँ
जो इस वजह से जुड़ गयी
क्योंकि हर किताबं में कुछ पन्ने
यूहीं शामिल कर दिये जातें हैं।

कुछ लोग ऐसे पन्नों में
अपने नाम लिख छोड़ देते हैं
तो कुछ लोग इन्हें
खाली ही रहने देते हैं।

मैं तुम्हारे वक़्त का वो छन हूँ
जिनके होने न होने से
ज़िन्दगी की रफ़्तार में
कोई खास फरक नहीं पठति
कुछ पल ऐसी भी होते हैं
जिनमे ज़िन्दगी कभी जीई नहीं जाती
आप ही गुज़र जाती है।

में तुम्हारे दिल का
वोह खली कमरा हूँ
जो केवल छट दीवाली होली में
खोल साफ कर दी जाती।

सितमगर मेरी, मेरी जुस्तजू
गर वक़्त मिले तो इन खली पन्नों पर
इक कलम चला देना
बस एक करम करना
with love के बाद
अपना ही नाम लिख देना।

1 comment:

  1. irrespective of the book, the page too has its own existence and identity...
    sometimes i mark my favourite pages in an otherwise normal book
    and revisit them...:)

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