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Showing posts from January, 2017

सकरात की शाम

आती होगी ना उनको भी
अपनें कटी पतंगों कि यादें
जो उड़ गयी क्षितिज में
और फिर न लौट आएंगे
उन पतंगों की यादें।मुझको तो है याद मेरे दोस्त
वो बत्तीस रुपैये कि लटाई
वो मांझे की सरसराहट
और हाथों में तुम्हारे
नए लाल हरे
चूड़ियों की खनखनाहट।चलो एक बार फिर मिल पतंग उड़ाएं
तुम चकरी संभालो और हम ढील लगाएं
इसी बहाने हम और तुम
सुनहरे आसमानों से हो घुलमिल
फिर संक्रांति मनाएं।

If you had loved me...

If you had loved me,
Half as much as I love you,
That would have been quite intolerable,
Even to myself. If you had ever looked at me, with the intensity
Of my hungry stares,
I would have probably felt
My soul clench within
My migrant heart as well. There ought to be no justice
In love
As in life And as in life
A poetic pause
Need not always precede
The sullen cry
Of the unloved.