Jan 16, 2017

सकरात की शाम

आती होगी ना उनको भी
अपनें कटी पतंगों कि यादें
जो उड़ गयी क्षितिज में
और फिर न लौट आएंगे
उन पतंगों की यादें।

मुझको तो है याद मेरे दोस्त
वो बत्तीस रुपैये कि लटाई
वो मांझे की सरसराहट
और हाथों में तुम्हारे
नए लाल हरे
चूड़ियों की खनखनाहट।

चलो एक बार फिर मिल पतंग उड़ाएं
तुम चकरी संभालो और हम ढील लगाएं
इसी बहाने हम और तुम
सुनहरे आसमानों से हो घुलमिल
फिर संक्रांति मनाएं।

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